तनहा मन…
13Jun11
चाँद तनहा है, आसमान तनहा…
दर्द मिला है कहाँ कहाँ तनहा…
बुझ गयी आस, चुप गया तारा…
थरथराता रहा धुआं तनहा…
जिंदगी क्या इसी को कहते हैं?
जिस्म तनहा और जान तनहा…
हमसफ़र अगर कोई मिले भी कहीं,
दोनों चलते रहे यहाँ तनहा…
जलती-बुझती-सी रौशनी के परे…
सिमटा सिमटा सा एक मकान तनहा…
राह देखा करेगी सदियों तक,
छोर जायेंगे ये जहाँ तनहा॥
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